📿 श्लोक संग्रह

धूमेनाव्रियते वह्निः

गीता 3.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥
धूमेन
धुएँ से
आव्रियते
ढका जाता है
वह्निः
अग्नि
यथा
जैसे
आदर्शः
दर्पण
मलेन
मैल से — धूल से
और
यथा उल्बेन
जैसे झिल्ली से
आवृतः गर्भः
ढका हुआ गर्भ
तथा तेन इदम्
वैसे ही इससे यह ज्ञान ढका है

यहाँ तीन उपमाएँ दी गई हैं — धुएँ से आग, मैल से दर्पण, झिल्ली से गर्भ। तीनों में एक चीज़ दूसरी को ढक देती है। वैसे ही काम ज्ञान को ढक देता है।

यह बहुत सुंदर उपमा है। ज्ञान नष्ट नहीं होता — वह आत्मा में है — पर काम उसे दिखने नहीं देता। जैसे धुएँ में आग बुझी नहीं, पर दिखती नहीं — वैसे ज्ञान ढका रहता है।

यह 3.37 की व्याख्या है। काम महाशनः है — वह ज्ञान को ही खा जाता है।

3.39 में यही बात और स्पष्ट होगी — ज्ञानियों का नित्य शत्रु काम, अग्नि के समान कभी तृप्त नहीं होता।

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