📿 श्लोक संग्रह

काम एष क्रोध एष

गीता 3.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
कामः एषः
यह काम है
क्रोधः एषः
यह क्रोध है
रजोगुणसमुद्भवः
रजोगुण से उत्पन्न
महाशनः
बहुत खाने वाला — सब कुछ खा जाने वाला
महापाप्मा
महापापी
विद्धि एनम्
इसे जानो
इह
यहाँ — इस संसार में
वैरिणम्
शत्रु को

अर्जुन के प्रश्न का उत्तर आ गया। वह शक्ति जो बिना चाहे पाप कराती है — वह है काम और क्रोध। काम यानी इच्छा — जो पूरी न हो तो क्रोध बन जाती है।

'महाशनः' — जो सब कुछ खा जाए। काम और क्रोध मनुष्य का विवेक, ज्ञान, शांति — सब नष्ट कर देते हैं। इसीलिए इसे शत्रु कहा गया है — जिसे पहचानना ज़रूरी है।

यह 3.36 का उत्तर है। काम और क्रोध का संबंध गीता 2.62–2.63 में भी विस्तार से आता है — काम से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृतिनाश।

3.38–3.43 में इस काम के आवरण और उससे मुक्ति का मार्ग बताया जाएगा।

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