📿 श्लोक संग्रह

अथ केन प्रयुक्तोऽयम्

गीता 3.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥
अथ
अब — तो फिर
केन प्रयुक्तः
किसके द्वारा प्रेरित
अयम्
यह मनुष्य
पापम् चरति
पाप करता है
पूरुषः
पुरुष — व्यक्ति
अनिच्छन् अपि
न चाहते हुए भी
वार्ष्णेय
हे वार्ष्णेय (कृष्ण)
बलात् इव
जैसे जबरदस्ती से
नियोजितः
प्रेरित किया गया

यह अर्जुन का एक और सुंदर प्रश्न है। वे कहते हैं — मनुष्य चाहता नहीं फिर भी पाप करता है, जैसे किसी ने जबरदस्ती करा दिया हो। यह कौन है? यह अनुभव हर मनुष्य का है।

'अनिच्छन्नपि' — न चाहते हुए भी। यह शब्द बहुत ईमानदार है। जब मनुष्य जानते हुए भी गलत करता है, तो वह भीतर से विभाजित महसूस करता है — अर्जुन का यह प्रश्न उसी का है।

यह प्रश्न 3.33–3.34 के बाद स्वाभाविक है। प्रकृति और राग-द्वेष की बात हुई, अब अर्जुन उस बाधक शक्ति का नाम जानना चाहते हैं।

कृष्ण का उत्तर 3.37 में मिलता है — यह काम है, क्रोध है।

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