📿 श्लोक संग्रह

ये त्वेतदभ्यसूयन्तः

गीता 3.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥
ये तु
परंतु जो
एतत्
इसे — इस शिक्षा को
अभ्यसूयन्तः
आक्षेप करते हुए — दोष देते हुए
न अनुतिष्ठन्ति
पालन नहीं करते
मे मतम्
मेरी शिक्षा को
सर्वज्ञानविमूढान्
सभी ज्ञान में भ्रमित
तान् विद्धि
उन्हें जानो
नष्टान्
भ्रष्ट — नष्ट बुद्धि वाले
अचेतसः
विवेकहीन

3.31 का विपरीत पक्ष यहाँ है। जो लोग इस शिक्षा पर आक्षेप करते हैं — 'यह ठीक नहीं, यह कैसे हो सकता है' — और पालन नहीं करते, उनकी बुद्धि भ्रमित है।

'सर्वज्ञानविमूढान्' — सभी ज्ञान में भ्रमित। यह कड़ी भाषा है। पर यहाँ कृष्ण यह नहीं कह रहे कि वे बुरे लोग हैं — वे कह रहे हैं कि उनका विवेक काम नहीं कर रहा। आक्षेप की बजाय खुले मन से सुनना जरूरी है।

यह 3.31 का दूसरा पहलू है — श्रद्धा के बिना पालन संभव नहीं, और आक्षेप से ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

गीता 4.40 में भी 'श्रद्धाहीन विनष्यति' — श्रद्धाहीन नष्ट होता है — यही बात दोहराई जाती है।

अध्याय 3 · 32 / 43
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