यह एक बहुत गहरा और ईमानदार श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है। सभी प्राणी अपनी-अपनी प्रकृति की ओर जाते हैं। बाहरी दमन से क्या होगा?
यहाँ 'निग्रह' — दमन — की सीमा बताई गई है। केवल बाहर से संयम थोपना पर्याप्त नहीं। स्वभाव को बदलने के लिए भीतरी साधना जरूरी है — और वह धीमी, दीर्घकालीन प्रक्रिया है।