📿 श्लोक संग्रह

सदृशं चेष्टते स्वस्याः

गीता 3.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥
सदृशम्
अनुसार — समान
चेष्टते
आचरण करता है
स्वस्याः प्रकृतेः
अपनी प्रकृति के
ज्ञानवान् अपि
ज्ञानी भी
प्रकृतिम् यान्ति
प्रकृति को प्राप्त होते हैं — उसी के अनुसार चलते हैं
भूतानि
सभी प्राणी
निग्रहः
बाहरी दमन — जबरदस्ती संयम
किम् करिष्यति
क्या करेगा

यह एक बहुत गहरा और ईमानदार श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही आचरण करता है। सभी प्राणी अपनी-अपनी प्रकृति की ओर जाते हैं। बाहरी दमन से क्या होगा?

यहाँ 'निग्रह' — दमन — की सीमा बताई गई है। केवल बाहर से संयम थोपना पर्याप्त नहीं। स्वभाव को बदलने के लिए भीतरी साधना जरूरी है — और वह धीमी, दीर्घकालीन प्रक्रिया है।

यह 3.5 ('प्रकृतिजैर्गुणैः') की बात को व्यक्तिगत जीवन में लागू करता है। प्रकृति बहुत बलशाली है।

3.34 में इस बात का व्यावहारिक उत्तर मिलता है — राग-द्वेष से बचना ही असली साधना है।

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