यह श्लोक एक सटीक चेतावनी है। हर इंद्रिय के अपने विषय होते हैं — आँख के लिए रूप, कान के लिए शब्द। इन विषयों के साथ राग (पसंद) और द्वेष (नापसंद) जुड़े हैं। ये दोनों मनुष्य के शत्रु हैं।
राग वह है जो खींचता है — 'यह चाहिए।' द्वेष वह है जो धकेलता है — 'यह नहीं चाहिए।' इन दोनों के वश में आने से मनुष्य अपना मार्ग भटक जाता है।