📿 श्लोक संग्रह

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे

गीता 3.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥
इन्द्रियस्य
इंद्रिय के
इन्द्रियस्य अर्थे
इंद्रिय के विषय में
रागद्वेषौ
राग और द्वेष
व्यवस्थितौ
स्थित हैं — बैठे हुए हैं
तयोः
उन दोनों के
न वशम् आगच्छेत्
वश में न आए
तौ हि
वे दोनों ही
अस्य
इसके — मनुष्य के
परिपन्थिनौ
शत्रु हैं — बाधक हैं

यह श्लोक एक सटीक चेतावनी है। हर इंद्रिय के अपने विषय होते हैं — आँख के लिए रूप, कान के लिए शब्द। इन विषयों के साथ राग (पसंद) और द्वेष (नापसंद) जुड़े हैं। ये दोनों मनुष्य के शत्रु हैं।

राग वह है जो खींचता है — 'यह चाहिए।' द्वेष वह है जो धकेलता है — 'यह नहीं चाहिए।' इन दोनों के वश में आने से मनुष्य अपना मार्ग भटक जाता है।

यह 3.33 का उत्तर है। प्रकृति को दमन से नहीं बदल सकते — पर राग और द्वेष को पहचानकर उनसे बच सकते हैं।

गीता 2.64 में इसी बात का सकारात्मक विकल्प है — जो प्रसाद-बुद्धि से इंद्रियों को नियंत्रित करता है वह शांत होता है।

अध्याय 3 · 34 / 43
अध्याय 3 · 34 / 43 अगला →