📿 श्लोक संग्रह

ये मे मतमिदं नित्यम्

गीता 3.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥
ये
जो
मे मतम् इदम्
मेरी इस शिक्षा को
नित्यम्
सदा — निरंतर
अनुतिष्ठन्ति
पालन करते हैं
मानवाः
मनुष्य
श्रद्धावन्तः
श्रद्धा से युक्त
अनसूयन्तः
बिना आक्षेप के — निर्दोष भाव से
मुच्यन्ते
मुक्त होते हैं
ते अपि
वे भी
कर्मभिः
कर्मों से

कृष्ण यहाँ एक सुंदर आश्वासन देते हैं। जो लोग इस शिक्षा को श्रद्धा से — बिना शक किए, बिना आलोचना किए — पालन करते हैं, वे भी कर्म-बंधन से मुक्त हो जाते हैं।

'ते अपि' — 'वे भी' — यह शब्द महत्वपूर्ण है। पूर्ण ज्ञान न भी हो, पर यदि श्रद्धा हो और पालन हो — तो भी मुक्ति संभव है। यह गीता की उदारता है।

यह 3.30 के बाद आता है — जो ईश्वर-अर्पण भाव से कर्म करते हैं उनकी दशा। श्रद्धा और अनासूया — ये दो गुण पालन के लिए जरूरी हैं।

गीता 18.68–18.69 में भी गीता की शिक्षा का श्रद्धापूर्वक प्रचार करने वाले की महिमा बताई गई है।

अध्याय 3 · 31 / 43
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