यह श्लोक अर्जुन को सीधा संदेश है — और यह गीता के पूरे संदेश का सारांश भी है। सब कर्म ईश्वर को अर्पण करो, निराशी और निर्मम होकर। फिर जो करना है करो — युद्ध हो या कोई भी कर्म।
'विगतज्वरः' — ज्वर यानी व्याकुलता, चिंता। जब कर्म ईश्वर को अर्पित हो जाता है, तो फल की चिंता नहीं रहती। मन शांत होता है — यही आध्यात्मिक स्वास्थ्य है।