📿 श्लोक संग्रह

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः

गीता 3.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥
प्रकृतेः गुणसम्मूढाः
प्रकृति के गुणों में पूरी तरह भ्रमित
सज्जन्ते
आसक्त होते हैं — लग जाते हैं
गुणकर्मसु
गुणों के कर्मों में
तान्
उन्हें
अकृत्स्नविदः
अपूर्ण ज्ञान वाले
मन्दान्
मंद बुद्धि वालों को
कृत्स्नवित्
पूर्ण ज्ञानी
न विचालयेत्
विचलित न करे

यह 3.26 की बात को और स्पष्ट करता है। जो लोग अभी गुणों में ही उलझे हैं — जिनकी बुद्धि अभी उस स्तर पर नहीं — उन्हें पूर्ण ज्ञानी को अचानक आत्मज्ञान की बातें सुनाकर विचलित नहीं करना चाहिए।

यह एक गहरी शिक्षा है — शिक्षा श्रोता की क्षमता के अनुसार होनी चाहिए। जो अभी कर्म में आसक्त है, उसे पहले कर्म करना सिखाओ — फिर धीरे-धीरे अनासक्ति की ओर ले जाओ।

यह 3.26 का विस्तार है। परंपरा में गुरु हमेशा शिष्य की स्थिति देखकर शिक्षा देते थे — यही इस श्लोक का सार है।

गीता 3.28 में पूर्ण ज्ञानी की अवस्था बताई, यहाँ उसकी जिम्मेदारी — दूसरों को विचलित न करे।

अध्याय 3 · 29 / 43
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