📿 श्लोक संग्रह

तत्त्ववित्तु महाबाहो

गीता 3.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥
तत्त्ववित्
तत्व जानने वाला — ज्ञानी
तु
परंतु
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
गुणकर्मविभागयोः
गुण और कर्म के विभाजन को
गुणाः गुणेषु
गुण ही गुणों में — गुण ही गुणों पर कार्य करते हैं
वर्तन्ते
व्यवहार करते हैं — लगे रहते हैं
इति मत्वा
ऐसा जानकर
न सज्जते
आसक्त नहीं होता

3.27 में भ्रमित मनुष्य था, यहाँ उसका उल्टा — तत्ववेत्ता। जो जानता है कि गुण ही गुणों पर कार्य करते हैं, वह आसक्त नहीं होता। वह समझता है — यह सब प्रकृति का खेल है, मेरी आत्मा इससे परे है।

'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' — यह गीता की एक अत्यंत गहरी उक्ति है। इंद्रियाँ (जो प्रकृति के गुण हैं) विषयों (जो भी गुण हैं) में लगती हैं — आत्मा इस सब से अलग है।

यह 3.27 का सकारात्मक विकल्प है। गीता 14.19–14.23 में गुणातीत की अवस्था और विस्तार से बताई गई है।

यह ज्ञान ही वह आधार है जिस पर निष्काम कर्म टिका रहता है।

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