📿 श्लोक संग्रह

प्रकृतेः क्रियमाणानि

गीता 3.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
प्रकृतेः
प्रकृति के द्वारा
क्रियमाणानि
किए जाते हैं — हो रहे हैं
गुणैः
गुणों से — सत्व, रज, तम से
कर्माणि सर्वशः
सभी तरह के कर्म
अहङ्कारविमूढात्मा
अहंकार से भ्रमित आत्मा वाला
कर्ता अहम्
मैं कर्ता हूँ
इति मन्यते
ऐसा मानता है — सोचता है

यह श्लोक कर्मयोग का गहरा दार्शनिक आधार है। कृष्ण कहते हैं — सब कर्म वास्तव में प्रकृति के तीन गुण करते हैं। आत्मा साक्षी है। परंतु जो अहंकार में डूबा है, वह सोचता है — 'मैंने किया।'

यह 'अहंकारविमूढात्मा' — अहंकार से भ्रमित — यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। जब तक 'मैंने किया' का भाव है, तब तक कर्म बंधन बनता है।

यह 3.5 का गहरा विस्तार है — वहाँ कहा था प्रकृति के गुण करवाते हैं, यहाँ बताया कि अहंकार इसे नहीं समझता।

गीता 13.20–13.21 में प्रकृति और पुरुष का यही संबंध विस्तार से वर्णित है।

अध्याय 3 · 27 / 43
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