यह श्लोक कर्मयोग का गहरा दार्शनिक आधार है। कृष्ण कहते हैं — सब कर्म वास्तव में प्रकृति के तीन गुण करते हैं। आत्मा साक्षी है। परंतु जो अहंकार में डूबा है, वह सोचता है — 'मैंने किया।'
यह 'अहंकारविमूढात्मा' — अहंकार से भ्रमित — यही मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। जब तक 'मैंने किया' का भाव है, तब तक कर्म बंधन बनता है।