📿 श्लोक संग्रह

न बुद्धिभेदं जनयेत्

गीता 3.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥
नहीं
बुद्धिभेदम्
बुद्धि में भ्रम — संशय
जनयेत्
उत्पन्न करे
अज्ञानाम्
अज्ञानियों में
कर्मसङ्गिनाम्
कर्म में आसक्त लोगों में
जोषयेत्
प्रेरित करे — रुचि बढ़ाए
सर्वकर्माणि
सभी कर्मों में
विद्वान्
ज्ञानी
युक्तः
योग में स्थित
समाचरन्
करते हुए — आचरण करते हुए

यह श्लोक एक व्यावहारिक सलाह है। ज्ञानी को चाहिए कि वह अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम न फैलाए। जो व्यक्ति अभी कर्म से जुड़ा है, उसे अचानक 'कर्म व्यर्थ है' बताना उसे भटका सकता है।

इसके बजाय ज्ञानी स्वयं योग में स्थित होकर सुंदर कर्म करे — और इस प्रकार दूसरों को भी कर्म के प्रति प्रेरित करे। यह शिक्षा वाणी से नहीं, आचरण से होती है।

यह 3.25 का व्यावहारिक विस्तार है — ज्ञानी और अज्ञानी दोनों के लिए कर्म करना जरूरी है, पर ज्ञानी को समझदारी से कार्य करना होगा।

गीता 18.67–18.68 में भी यह संकेत है — जो तैयार नहीं, उसे जबरन यह ज्ञान मत दो।

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