📿 श्लोक संग्रह

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसः

गीता 3.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
सक्ताः
आसक्त — लगाव सहित
कर्मणि
कर्म में
अविद्वांसः
अज्ञानी लोग
यथा कुर्वन्ति
जैसे करते हैं
भारत
हे भारत (अर्जुन)
कुर्यात् विद्वान्
वैसे ही ज्ञानी को करना चाहिए
तथा असक्तः
उसी तरह पर अनासक्त होकर
चिकीर्षुः
इच्छुक — करना चाहते हुए
लोकसंग्रहम्
लोक-कल्याण को

यहाँ अज्ञानी और ज्ञानी दोनों कर्म करते हैं — पर उनके भाव अलग हैं। अज्ञानी आसक्ति से करता है — फल की चाह से। ज्ञानी वैसा ही दिखने वाला कर्म करता है, पर भीतर अनासक्त रहता है।

ज्ञानी क्यों कर्म करता है? 'लोकसंग्रह' — समाज को एकजुट रखने के लिए, लोगों की भलाई के लिए। उसका उद्देश्य ऊँचा है — केवल अपना फल नहीं।

यह 3.19 के 'असक्तः सततम्' को और स्पष्ट करता है। बाहर से कर्म एक जैसा, भीतर से भाव अलग।

गीता 4.18 में भी यही विचार मिलता है — जो अकर्म में कर्म और कर्म में अकर्म देखता है वह ज्ञानी है।

अध्याय 3 · 25 / 43
अध्याय 3 · 25 / 43 अगला →