यह श्लोक एक व्यावहारिक सलाह है। ज्ञानी को चाहिए कि वह अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम न फैलाए। जो व्यक्ति अभी कर्म से जुड़ा है, उसे अचानक 'कर्म व्यर्थ है' बताना उसे भटका सकता है।
इसके बजाय ज्ञानी स्वयं योग में स्थित होकर सुंदर कर्म करे — और इस प्रकार दूसरों को भी कर्म के प्रति प्रेरित करे। यह शिक्षा वाणी से नहीं, आचरण से होती है।