3.17 की आत्मज्ञानी अवस्था का और स्पष्टीकरण यहाँ है। उस व्यक्ति के लिए न कर्म करने से कोई लाभ है, न न करने से कोई हानि। वह पूर्ण है — किसी भी प्राणी पर उसकी निर्भरता नहीं।
यह स्वतंत्रता की सबसे ऊँची अवस्था है। जो आत्मा में स्थित है, उसे न प्रशंसा की जरूरत है, न निंदा का डर। सब प्राणियों में उसका कोई स्वार्थ नहीं — यह निर्लिप्तता है।