📿 श्लोक संग्रह

नैव तस्य कृतेनार्थः

गीता 3.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥
न एव
नहीं
तस्य
उसके लिए
कृतेन
कर्म करने से
अर्थः
प्रयोजन — लाभ
न अकृतेन
न करने से भी नहीं
इह
इस संसार में
कश्चन
कुछ भी
न च
और न ही
अस्य
इसका — उसका
सर्वभूतेषु
सभी प्राणियों में
कश्चित् अर्थव्यपाश्रयः
किसी से कोई स्वार्थ-आधार

3.17 की आत्मज्ञानी अवस्था का और स्पष्टीकरण यहाँ है। उस व्यक्ति के लिए न कर्म करने से कोई लाभ है, न न करने से कोई हानि। वह पूर्ण है — किसी भी प्राणी पर उसकी निर्भरता नहीं।

यह स्वतंत्रता की सबसे ऊँची अवस्था है। जो आत्मा में स्थित है, उसे न प्रशंसा की जरूरत है, न निंदा का डर। सब प्राणियों में उसका कोई स्वार्थ नहीं — यह निर्लिप्तता है।

यह 3.17 का विस्तार है। गीता 2.55–2.72 में स्थितप्रज्ञ के जो लक्षण बताए गए थे, उन्हीं का यहाँ दूसरे रूप में वर्णन है।

गीता 6.32 में भी आत्मज्ञानी की यह अवस्था — सब में स्वयं को और स्वयं में सब को देखना — वर्णित है।

अध्याय 3 · 18 / 43
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