📿 श्लोक संग्रह

तस्मादसक्तः सततम्

गीता 3.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥
तस्मात्
इसलिए
असक्तः
अनासक्त — बिना लगाव के
सततम्
सदा — हमेशा
कार्यम् कर्म
करने योग्य कर्म
समाचर
करो — आचरण करो
असक्तः
अनासक्त होकर
आचरन्
करते हुए
कर्म
कर्म
परम्
परम — परमात्मा को
आप्नोति
प्राप्त करता है

यह श्लोक कर्मयोग का सार है। 'तस्मात्' यानी इसलिए — अब तक जो कुछ कहा, उसका निष्कर्ष यह है — अनासक्त होकर कर्म करो। सतत, बिना थके, बिना फल की चिंता के।

'परमाप्नोति' — परम को प्राप्त करता है। यह परम क्या है? मोक्ष, ईश्वर, आत्मज्ञान — जो भी उसके लिए सबसे ऊँचा है। अनासक्त कर्म वह सेतु है जो साधारण जीवन को असाधारण बनाता है।

यह गीता 2.47 ('कर्मण्येवाधिकारस्ते') का विस्तार है — वहाँ कर्म का अधिकार था, यहाँ उसका उद्देश्य भी स्पष्ट है।

गीता के इस सिद्धांत को — अनासक्त कर्म — भारतीय परंपरा में 'निष्काम कर्म' कहा जाता रहा है।

अध्याय 3 · 19 / 43
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