📿 श्लोक संग्रह

यस्त्वात्मरतिरेव स्यात्

गीता 3.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
यः तु
परंतु जो
आत्मरतिः
आत्मा में रमने वाला
एव स्यात्
ही हो
आत्मतृप्तः
आत्मा से तृप्त — आत्मा में संतुष्ट
और
मानवः
मनुष्य
आत्मनि एव
केवल आत्मा में
सन्तुष्टः
संतुष्ट
तस्य
उसके लिए
कार्यम् न विद्यते
कोई कर्तव्य नहीं रहता

3.16 का अपवाद यहाँ आता है। जो व्यक्ति आत्मज्ञान में पूरी तरह स्थित है — जो केवल आत्मा में रमता है, आत्मा से ही तृप्त है — उसके लिए कोई कर्तव्य बाकी नहीं। यह अवस्था ज्ञानी की है।

यह श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी के लिए न करने में भी कोई दोष नहीं। परंतु यह अवस्था सिद्ध ज्ञानी की है — साधारण व्यक्ति के लिए नहीं।

यह 3.16 का पूरक है — आम मनुष्य के लिए यज्ञ-चक्र जरूरी है, पर आत्मज्ञानी के लिए नहीं।

गीता 3.18 में इसी बात को आगे बढ़ाया गया है — ऐसे ज्ञानी का किसी पर आधार नहीं रहता।

अध्याय 3 · 17 / 43
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