3.16 का अपवाद यहाँ आता है। जो व्यक्ति आत्मज्ञान में पूरी तरह स्थित है — जो केवल आत्मा में रमता है, आत्मा से ही तृप्त है — उसके लिए कोई कर्तव्य बाकी नहीं। यह अवस्था ज्ञानी की है।
यह श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कृष्ण कहते हैं कि ज्ञानी के लिए न करने में भी कोई दोष नहीं। परंतु यह अवस्था सिद्ध ज्ञानी की है — साधारण व्यक्ति के लिए नहीं।