📿 श्लोक संग्रह

एवं प्रवर्तितं चक्रम्

गीता 3.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥
एवम्
इस प्रकार
प्रवर्तितम् चक्रम्
चलाया गया यह चक्र
न अनुवर्तयति
अनुसरण नहीं करता
इह
इस संसार में
यः
जो
अघायुः
पापमय जीवन वाला
इन्द्रियारामः
इंद्रियों में रमने वाला
मोघम्
व्यर्थ
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
सः जीवति
वह जीता है

यज्ञ-चक्र की व्याख्या के बाद कृष्ण कहते हैं — जो इस चक्र का पालन नहीं करता, वह व्यर्थ जीता है। 'अघायुः' — पाप से भरा जीवन। 'इंद्रियाराम' — जो केवल इंद्रियों के सुख में डूबा रहता है।

यह कड़ी बात है — पर सत्य है। जब मनुष्य केवल अपने लिए जीता है, समाज और प्रकृति का ऋण नहीं चुकाता, तो उसका जीवन अर्थहीन हो जाता है।

यह 3.10–3.15 के यज्ञ-चक्र का निष्कर्ष है। इस चक्र से बाहर रहना जीवन को खाली बना देता है।

3.17 में इसका एकमात्र अपवाद बताया जाएगा — जो आत्मा में रमता है, उसके लिए यह नियम अलग है।

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