यहाँ यज्ञ-चक्र की जड़ बताई गई है। कर्म कहाँ से आया? वेद से। वेद कहाँ से आया? अविनाशी परब्रह्म से। तो अंततः सारा कर्म और यज्ञ ब्रह्म में ही आधारित है।
'सर्वगतं ब्रह्म' — जो सब जगह है वह ब्रह्म — वह यज्ञ में सदा प्रतिष्ठित है। इसका अर्थ यह है कि जब हम सच्चे भाव से यज्ञ करते हैं, तब परब्रह्म की उपस्थिति वहाँ होती है।