📿 श्लोक संग्रह

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि

गीता 3.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
कर्म
कर्म
ब्रह्मोद्भवम्
ब्रह्म से उत्पन्न
विद्धि
जानो — समझो
ब्रह्म
वेद — ब्रह्म
अक्षरसमुद्भवम्
अविनाशी (परब्रह्म) से उत्पन्न
तस्मात्
इसलिए
सर्वगतम्
सर्वव्यापी
ब्रह्म
ब्रह्म
नित्यम्
सदा
यज्ञे प्रतिष्ठितम्
यज्ञ में प्रतिष्ठित है

यहाँ यज्ञ-चक्र की जड़ बताई गई है। कर्म कहाँ से आया? वेद से। वेद कहाँ से आया? अविनाशी परब्रह्म से। तो अंततः सारा कर्म और यज्ञ ब्रह्म में ही आधारित है।

'सर्वगतं ब्रह्म' — जो सब जगह है वह ब्रह्म — वह यज्ञ में सदा प्रतिष्ठित है। इसका अर्थ यह है कि जब हम सच्चे भाव से यज्ञ करते हैं, तब परब्रह्म की उपस्थिति वहाँ होती है।

यह 3.14 की श्रृंखला का समापन है — कर्म से लेकर ब्रह्म तक की पूरी कड़ी यहाँ पूर्ण होती है।

गीता 4.24 में भी 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः' कहकर इसी विचार को और गहरा किया गया है।

अध्याय 3 · 15 / 43
अध्याय 3 · 15 / 43 अगला →