यहाँ एक सुंदर चक्र है — कर्म → यज्ञ → वर्षा → अन्न → जीव। यह केवल कृषि का विज्ञान नहीं, एक दार्शनिक दृष्टि है। जब मनुष्य सही कर्म करता है, तो प्रकृति का संतुलन बना रहता है।
गीता यहाँ बताती है कि कर्म केवल व्यक्तिगत नहीं होता — इसके परिणाम पूरी सृष्टि को प्रभावित करते हैं। इसीलिए कर्म की जिम्मेदारी बड़ी है।