📿 श्लोक संग्रह

अन्नाद्भवन्ति भूतानि

गीता 3.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
अन्नात्
अन्न से
भवन्ति भूतानि
जीव उत्पन्न होते हैं
पर्जन्यात्
वर्षा से
अन्न सम्भवः
अन्न की उत्पत्ति
यज्ञात्
यज्ञ से
भवति पर्जन्यः
वर्षा होती है
यज्ञः
यज्ञ
कर्मसमुद्भवः
कर्म से उत्पन्न

यहाँ एक सुंदर चक्र है — कर्म → यज्ञ → वर्षा → अन्न → जीव। यह केवल कृषि का विज्ञान नहीं, एक दार्शनिक दृष्टि है। जब मनुष्य सही कर्म करता है, तो प्रकृति का संतुलन बना रहता है।

गीता यहाँ बताती है कि कर्म केवल व्यक्तिगत नहीं होता — इसके परिणाम पूरी सृष्टि को प्रभावित करते हैं। इसीलिए कर्म की जिम्मेदारी बड़ी है।

यह यज्ञ-चक्र की वैज्ञानिक और दार्शनिक व्याख्या है। वर्षा और कृषि का संबंध यज्ञ से जोड़ना वैदिक विचार है।

3.15 में इस चक्र का उद्गम — ब्रह्म — बताया जाएगा, जो इस पूरी श्रृंखला को पूर्ण करता है।

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