गीता में 'यज्ञशिष्ट' का अर्थ है — वह जो पहले दूसरों को दिया जाए, उसके बाद जो बचे। सज्जन ऐसे ही खाते हैं — पहले अर्पण, फिर भोग। ऐसे लोग सभी पापों से मुक्त होते हैं।
दूसरी ओर — जो केवल अपने लिए पकाते हैं और खाते हैं, वे पाप खाते हैं। यह सिद्धांत बहुत व्यापक है — 'केवल अपने लिए' जीना ही पाप की जड़ है।