यहाँ एक कड़ी बात कही गई है — जो व्यक्ति समाज और प्रकृति से लेता है, पर बदले में कुछ नहीं देता, वह चोर के समान है। यज्ञ यानी देना — अपना समय, श्रम, संसाधन — समाज के लिए।
'स्तेन' यानी चोर — यह शब्द तीखा है। गीता यहाँ स्वार्थी भोग की आलोचना करती है। जो केवल लेता है, देता नहीं — वह समाज के साथ अन्याय करता है।