📿 श्लोक संग्रह

इष्टान्भोगान्हि वो देवाः

गीता 3.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥
इष्टान् भोगान्
इच्छित भोग-वस्तुएँ
हि
निश्चय ही
वः देवाः
तुम्हें देव
दास्यन्ते
देंगे
यज्ञभाविताः
यज्ञ से संतुष्ट होकर
तैः दत्तान्
उनके द्वारा दी गई वस्तुओं को
अप्रदाय
बिना अर्पण किए
यः भुङ्क्ते
जो भोगता है
स्तेनः एव सः
वह चोर ही है

यहाँ एक कड़ी बात कही गई है — जो व्यक्ति समाज और प्रकृति से लेता है, पर बदले में कुछ नहीं देता, वह चोर के समान है। यज्ञ यानी देना — अपना समय, श्रम, संसाधन — समाज के लिए।

'स्तेन' यानी चोर — यह शब्द तीखा है। गीता यहाँ स्वार्थी भोग की आलोचना करती है। जो केवल लेता है, देता नहीं — वह समाज के साथ अन्याय करता है।

यह 3.11 का परिणाम है। देवों और प्रकृति के साथ परस्पर संबंध — एकतरफा लेना चोरी है।

गीता 4.31 में भी कहा गया है — जो यज्ञ-शेष नहीं खाते, वे पाप खाते हैं।

अध्याय 3 · 12 / 43
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