📿 श्लोक संग्रह

देवान्भावयतानेन

गीता 3.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥
देवान्
देवों को
भावयत
पोषण दो — प्रसन्न करो
अनेन
इस यज्ञ से
ते देवाः
वे देव
भावयन्तु वः
तुम्हें पोषण दें
परस्परम्
एक-दूसरे को
भावयन्तः
पोषण देते हुए
श्रेयः परम्
परम कल्याण को
अवाप्स्यथ
प्राप्त करोगे

यह श्लोक एक सुंदर चक्र बताता है। मनुष्य यज्ञ करे, देव प्रसन्न हों। देव वर्षा दें, अन्न हो, मनुष्य जीएं। यह परस्पर का संबंध है — देना और लेना, एक-दूसरे का पालन करना।

गीता में 'देव' केवल स्वर्ग के देवता नहीं — प्रकृति की शक्तियाँ भी हैं। यज्ञ जब समाज के हित में होता है, तो प्रकृति भी सहयोग करती है — यह परंपरागत दृष्टि है।

यह यज्ञ-चक्र 3.10 से आगे बढ़ता है। वैदिक परंपरा में यज्ञ और प्रकृति के बीच का यह संबंध ऋग्वेद और अथर्ववेद में भी वर्णित है।

गीता इस परंपरागत विचार को कर्मयोग की भाषा में प्रस्तुत करती है — जो देता है, उसे मिलता है।

अध्याय 3 · 11 / 43
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