📿 श्लोक संग्रह

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा

गीता 3.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
सहयज्ञाः
यज्ञ के साथ
प्रजाः सृष्ट्वा
प्रजा की रचना करके
पुरा
पहले — आदि में
उवाच
कहा
प्रजापतिः
प्रजापति — सृष्टिकर्ता
अनेन
इसके द्वारा — यज्ञ से
प्रसविष्यध्वम्
बढ़ो — फलो-फूलो
एषः
यह
वः
तुम्हारा
इष्टकामधुक्
इच्छित कामनाएँ पूर्ण करने वाली कामधेनु

यहाँ एक पौराणिक कथा का संदर्भ आता है। प्रजापति ने सृष्टि के आरंभ में प्रजा के साथ यज्ञ की परंपरा भी बनाई। उन्होंने कहा — इस यज्ञ से तुम फलो-फूलो, यह तुम्हारी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

'इष्टकामधुक्' — यानी यज्ञ एक ऐसी कामधेनु है जो जो चाहो वह देती है। परंतु यह केवल भौतिक नहीं है — जब मनुष्य समाज के लिए, परमार्थ के लिए कर्म करता है, तो उसकी जरूरतें स्वयं पूरी होती हैं।

यह यज्ञ-चक्र की परंपरागत व्याख्या है जो महाभारत और पुराणों में भी आती है। प्रजापति की यह बात सृष्टि के मूल सिद्धांत को दर्शाती है।

3.10 से 3.16 तक का पूरा खंड यज्ञ-चक्र की विस्तृत व्याख्या है — यह गीता के कर्मयोग का दार्शनिक आधार है।

अध्याय 3 · 10 / 43
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