यहाँ एक पौराणिक कथा का संदर्भ आता है। प्रजापति ने सृष्टि के आरंभ में प्रजा के साथ यज्ञ की परंपरा भी बनाई। उन्होंने कहा — इस यज्ञ से तुम फलो-फूलो, यह तुम्हारी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
'इष्टकामधुक्' — यानी यज्ञ एक ऐसी कामधेनु है जो जो चाहो वह देती है। परंतु यह केवल भौतिक नहीं है — जब मनुष्य समाज के लिए, परमार्थ के लिए कर्म करता है, तो उसकी जरूरतें स्वयं पूरी होती हैं।