📿 श्लोक संग्रह

तस्माद्यस्य महाबाहो

गीता 2.68 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
तस्मात्
इसलिए
यस्य
जिसकी
महाबाहो
हे महाबाहु
निगृहीतानि सर्वशः
सब ओर से संयमित
इन्द्रियाणि
इंद्रियाँ
इन्द्रियार्थेभ्यः
इंद्रिय-विषयों से
तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
उसकी प्रज्ञा स्थिर है

कृष्ण कहते हैं — इसलिए हे महाबाहु, जिसकी इंद्रियाँ सभी ओर से इंद्रिय-विषयों से संयमित हैं — उसकी प्रज्ञा स्थिर है। यह 2.58 और 2.61 में कही बात का पुनः निष्कर्ष है।

यह पुनरावृत्ति जानबूझकर है। गीता में जो बातें बार-बार आती हैं, वे सबसे महत्वपूर्ण हैं। इंद्रिय-संयम और स्थिर प्रज्ञा — इन दोनों का संबंध कृष्ण को बहुत महत्वपूर्ण लगता है।

भगवद्गीता में 2.67 के बाद यह निष्कर्ष आता है — वहाँ बताया था कि इंद्रियाँ जिस विषय में विचरती हैं, मन वहाँ चला जाता है। यहाँ समाधान है — संयम।

'निगृहीतानि' — संयमित, रोकी हुई — यह केवल दमन नहीं, बल्कि अनुशासित दिशा देना है।

अध्याय 2 · 68 / 72
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