📿 श्लोक संग्रह

यदा संहरते चायम्

गीता 2.58 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
यदा
जब
अयम्
यह (व्यक्ति)
संहरते
समेट लेता है
कूर्मः अङ्गानि इव
कछुए की तरह अपने अंग
सर्वशः
सभी तरफ से
इन्द्रियाणि
इंद्रियों को
इन्द्रियार्थेभ्यः
इंद्रिय-विषयों से
तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
उसकी प्रज्ञा स्थिर है

कृष्ण एक अत्यंत सरल और सुंदर उपमा देते हैं — जैसे कछुआ खतरे में अपने सभी अंग अपने कवच के भीतर समेट लेता है — वैसे ही जो अपनी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से समेट लेता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।

यह उपमा बच्चों को भी आसानी से समझ में आ जाती है। कछुआ बाहर का खतरा महसूस करते ही भीतर हो जाता है। वैसे ही स्थितप्रज्ञ बाहरी लोभ-प्रलोभन आने पर अपनी इंद्रियों को भीतर खींच लेता है।

भगवद्गीता में कछुए की यह उपमा गीता की सबसे प्रसिद्ध उपमाओं में से एक है। यह सरल लेकिन गहरी है।

इंद्रिय-संयम का यह विचार पतंजलि के योगसूत्र में 'प्रत्याहार' के रूप में भी मिलता है — इंद्रियों को विषयों से वापस खींचना।

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