📿 श्लोक संग्रह

गुरूनहत्वा हि महानुभावान्

गीता 2.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ॥
गुरून्
गुरुओं को
अहत्वा
न मारकर
महानुभावान्
महान आत्माओं को
श्रेयः
अधिक उचित है
भोक्तुम्
भोगना
भैक्ष्यम्
भिक्षा
हत्वा
मारकर
रुधिरप्रदिग्धान्
रक्त से सने हुए

अर्जुन कहते हैं — इन महान आत्माओं गुरुओं को मारे बिना इस लोक में भिक्षा माँगकर जीना भी उचित है। अगर इन्हें मारकर धन और भोग पाना हो, तो वे भोग रक्त से सने होंगे — ऐसा जीवन कैसे जीएँगे?

यह अर्जुन का सबसे मार्मिक वचन है। वे कह रहे हैं — जो सुख गुरुओं के रक्त से मिले, वह सुख नहीं, पाप है। यह भावना उनके उच्च चरित्र को दिखाती है, लेकिन कृष्ण आगे बताएँगे कि धर्मयुद्ध में यह सोच पूरी नहीं है।

भगवद्गीता के अनुसार अर्जुन यहाँ अपनी पीड़ा की चरम सीमा पर हैं। 'रुधिरप्रदिग्धान्' — रक्त से सने भोग — यह छवि अर्जुन के मन की घृणा और पश्चाताप को दर्शाती है।

गुरु-शिष्य संबंध भारतीय परंपरा में सबसे पवित्र माना गया है। इसीलिए अर्जुन की यह वेदना स्वाभाविक है।

अध्याय 2 · 5 / 72
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