अर्जुन कहते हैं — इन महान आत्माओं गुरुओं को मारे बिना इस लोक में भिक्षा माँगकर जीना भी उचित है। अगर इन्हें मारकर धन और भोग पाना हो, तो वे भोग रक्त से सने होंगे — ऐसा जीवन कैसे जीएँगे?
यह अर्जुन का सबसे मार्मिक वचन है। वे कह रहे हैं — जो सुख गुरुओं के रक्त से मिले, वह सुख नहीं, पाप है। यह भावना उनके उच्च चरित्र को दिखाती है, लेकिन कृष्ण आगे बताएँगे कि धर्मयुद्ध में यह सोच पूरी नहीं है।