📿 श्लोक संग्रह

कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये

गीता 2.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥
कथम्
कैसे
भीष्मम्
भीष्म को
अहम्
मैं
सङ्ख्ये
युद्ध में
द्रोणम्
द्रोणाचार्य को
इषुभिः
बाणों से
प्रतियोत्स्यामि
सामना करूँगा
पूजार्हौ
पूजनीय
अरिसूदन
शत्रुओं का नाश करने वाले

अर्जुन कृष्ण से पूछते हैं — हे मधुसूदन, जो भीष्म और द्रोण पूजनीय हैं, उन पर मैं युद्ध में बाण कैसे चला सकता हूँ? यह प्रश्न अर्जुन की नैतिक पीड़ा को दर्शाता है। भीष्म उनके पितामह हैं और द्रोण उनके गुरु — दोनों श्रद्धा के पात्र हैं।

यहाँ अर्जुन की दुविधा वास्तविक है। एक तरफ़ धर्मयुद्ध का कर्तव्य है, दूसरी तरफ़ अपने पूज्यों के प्रति सम्मान। कृष्ण इसी गहरे प्रश्न का उत्तर पूरी गीता में देते हैं।

भगवद्गीता के अनुसार यह अर्जुन का संकट का केंद्रीय प्रश्न है। भीष्म और द्रोण, दोनों कौरव-पक्ष में खड़े हैं — फिर भी अर्जुन उन्हें दुश्मन नहीं मान सकते।

'पूजार्हौ' शब्द यहाँ बहुत महत्वपूर्ण है — जो पूजा के योग्य हैं। अर्जुन की यह भावना उनकी कमज़ोरी नहीं बल्कि उनके संस्कारों की गहराई है।

अध्याय 2 · 4 / 72
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