📿 श्लोक संग्रह

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

गीता 2.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
कायरता के दोष से दबा स्वभाव
पृच्छामि
पूछता हूँ
धर्मसम्मूढचेताः
धर्म के विषय में भ्रमित मन
यत् श्रेयः
जो श्रेयस्कर हो
निश्चितम्
निश्चित रूप से
ब्रूहि
बताइए
शिष्यः ते
आपका शिष्य हूँ
शाधि
शिक्षा दीजिए
प्रपन्नम्
शरण में आया हूँ

यह श्लोक गीता का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। अर्जुन कहते हैं — मेरा स्वभाव कायरता के दोष से दब गया है। मेरा मन धर्म के विषय में भ्रमित है। आप मुझे निश्चित रूप से बताइए कि मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है। मैं आपका शिष्य हूँ — मुझे शिक्षा दीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ।

जब कोई शिष्य सच्चे हृदय से कहता है कि मैं आपकी शरण में हूँ — तभी गुरु का उपदेश संभव होता है। अर्जुन ने यही किया। इस श्लोक के बाद गीता का असली ज्ञान आरंभ होता है।

भगवद्गीता के अनुसार यह गुरु-शिष्य संबंध का स्थापन-क्षण है। जब तक अर्जुन अपने मित्र और सारथी की तरह कृष्ण से बात कर रहे थे, ज्ञान नहीं हो सकता था। जब उन्होंने शिष्यत्व स्वीकार किया, तभी उपदेश संभव हुआ।

'प्रपन्नम्' शब्द — शरण में आया हुआ — भक्ति परंपरा में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह समर्पण का भाव है।

अध्याय 2 · 7 / 72
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