यह श्लोक गीता का सबसे महत्वपूर्ण क्षण है। अर्जुन कहते हैं — मेरा स्वभाव कायरता के दोष से दब गया है। मेरा मन धर्म के विषय में भ्रमित है। आप मुझे निश्चित रूप से बताइए कि मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है। मैं आपका शिष्य हूँ — मुझे शिक्षा दीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ।
जब कोई शिष्य सच्चे हृदय से कहता है कि मैं आपकी शरण में हूँ — तभी गुरु का उपदेश संभव होता है। अर्जुन ने यही किया। इस श्लोक के बाद गीता का असली ज्ञान आरंभ होता है।