यह श्लोक गीता 2.47 के ठीक बाद आता है और उसे पूरा करता है। कृष्ण कहते हैं — आसक्ति छोड़कर, योग में स्थित होकर कर्म करो। सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखो। यही समता योग कहलाती है।
कितनी सुंदर परिभाषा है योग की — 'समत्वं योग उच्यते' — समता ही योग है। न सफलता में फूलो, न असफलता में कुम्हलाओ। बस अपना काम करते रहो।
जैसे एक अनुभवी नाविक — तूफान आए या शांति हो — अपनी नाव चलाता रहता है। वह न तूफान से डरता है, न शांत समुद्र में लापरवाह होता है।