कृष्ण एक सुंदर उपमा देते हैं — जैसे चारों ओर पानी भरा हो तो कुएँ का उतना ही उपयोग रह जाता है जितना जरूरत के लिए हो — वैसे ही जो ब्रह्म को जानता है, उसके लिए समस्त वेदों में उतना ही है जितना आवश्यक है। ज्ञानी के पास वेदों का सार स्वयं है।
यह उपमा बहुत गहरी है। जब किसी को पूरी नदी का ज्ञान हो, तो वह एक घड़े के पानी के लिए परेशान नहीं होता। जब ब्रह्मज्ञान हो, तो शास्त्रों के विभिन्न अनुष्ठानों की आवश्यकता उतनी नहीं रह जाती।