कृष्ण कहते हैं — वेद तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के विषयों को बताते हैं; हे अर्जुन, तुम तीन गुणों से परे हो जाओ। द्वंद्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित, प्राप्ति-रक्षा की चिंता से मुक्त और आत्म-परायण बनो।
यह एक ऊँचा आदर्श है। तीन गुणों से परे — यानी न सिर्फ़ सात्त्विक बनो, बल्कि गुणों की आसक्ति से ही ऊपर उठो। जैसे नदी के किनारे खड़ा पेड़ न बाढ़ में बहता है, न सूखे में सूखता — वैसे ही गुणातीत पुरुष परिस्थितियों से अप्रभावित रहता है।