📿 श्लोक संग्रह

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्

गीता 2.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥
हतः वा
मारे जाने पर
प्राप्स्यसि स्वर्गम्
स्वर्ग पाओगे
जित्वा वा
जीतने पर
भोक्ष्यसे महीम्
पृथ्वी का भोग करोगे
तस्मात् उत्तिष्ठ
इसलिए उठो
कौन्तेय
हे कुंती-पुत्र
युद्धाय
युद्ध के लिए
कृतनिश्चयः
निश्चय करके

कृष्ण का यह श्लोक बहुत सीधा और शक्तिशाली है। वे कहते हैं — या तो मारे जाओगे और स्वर्ग पाओगे, या जीतोगे और पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए हे कौन्तेय, निश्चय करके उठो और युद्ध करो। दोनों ही परिणाम लाभकारी हैं।

यह तर्क बहुत व्यावहारिक है। जब हर रास्ता अच्छा हो, तो डर किस बात का? कृष्ण अर्जुन को यही दिखाना चाहते हैं — कर्तव्य-पथ पर चलने में घाटा नहीं, केवल लाभ है।

भगवद्गीता में 2.33–2.37 तक कृष्ण ने सांसारिक दृष्टि से कर्तव्य का तर्क दिया। यह श्लोक उस तर्क की परिणति है।

'कृतनिश्चयः' — निश्चय करके — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। कृष्ण चाहते हैं कि अर्जुन भ्रम में नहीं, स्पष्ट निर्णय के साथ कदम उठाएँ।

अध्याय 2 · 37 / 72
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