📿 श्लोक संग्रह

अवाच्यवादांश्च बहून्

गीता 2.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥
अवाच्यवादान्
न कहने योग्य बातें
बहून्
बहुत सी
वदिष्यन्ति
कहेंगे
तव अहिताः
तुम्हारे शत्रु
निन्दन्तः
निंदा करते हुए
तव सामर्थ्यम्
तुम्हारी शक्ति की
ततः दुःखतरम्
उससे अधिक दुःखद
नु किम्
क्या होगा भला

कृष्ण कहते हैं — तुम्हारे शत्रु बहुत-सी न कहने योग्य बातें कहेंगे और तुम्हारी शक्ति की निंदा करेंगे। इससे बड़ा दुःख और क्या होगा? यह प्रश्न-रूप में दिया गया वाक्य बहुत प्रभावी है।

कृष्ण जानते थे कि अर्जुन एक गौरवान्वित योद्धा हैं। शत्रुओं से निंदा सुनना — यह उनके लिए सबसे बड़ी पीड़ा होगी। कृष्ण इसी बिंदु को छूते हैं ताकि अर्जुन वास्तविकता देखें।

भगवद्गीता में 2.33 से 2.36 तक कृष्ण ने सांसारिक दृष्टि से युद्ध न करने के परिणाम बताए हैं। यह तर्क उन लोगों के लिए है जो आत्मज्ञान के तर्क से तुरंत प्रभावित न हों।

शत्रु की निंदा और मित्रों की दृष्टि में गिरना — दोनों को कृष्ण ने बड़ी दक्षता से उठाया है।

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