📿 श्लोक संग्रह

सुखदुःखे समे कृत्वा

गीता 2.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
सुखदुःखे
सुख और दुख को
समे कृत्वा
समान मानकर
लाभालाभौ
लाभ और हानि को
जयाजयौ
जय और पराजय को
ततः
तब
युद्धाय
युद्ध के लिए
युज्यस्व
तैयार हो जाओ
न एवम्
इस प्रकार नहीं
पापम्
पाप
अवाप्स्यसि
प्राप्त करोगे

कृष्ण कहते हैं — सुख-दुख को, लाभ-हानि को, जय-पराजय को समान मानकर युद्ध करो। ऐसा करने से तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।

यह समत्व (समान भाव) गीता की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाओं में से एक है। जब हम किसी काम को न सुख के लालच से करते हैं, न दुख के डर से — तब वह कर्म शुद्ध हो जाता है।

जैसे एक अच्छा खिलाड़ी मैच खेलते समय न जीत के बारे में सोचता है न हार के — वह बस अपना सर्वश्रेष्ठ खेल खेलता है। कृष्ण अर्जुन से यही कह रहे हैं।

यह श्लोक सांख्ययोग (ज्ञान) से कर्मयोग (कर्म) की ओर संक्रमण का बिंदु है। कृष्ण ने पहले आत्मा का ज्ञान दिया, अब कर्म की विधि बता रहे हैं।

गीता 2.47 (कर्मण्येवाधिकारस्ते) और 2.48 (योगस्थः कुरु कर्माणि) इसी शिक्षा को आगे बढ़ाते हैं।

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