📿 श्लोक संग्रह

भयाद्रणादुपरतम्

गीता 2.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥
भयात् रणात् उपरतम्
डर से युद्ध से हटा हुआ
मंस्यन्ते
समझेंगे
त्वाम्
तुम्हें
महारथाः
महारथी वीर
येषाम्
जिनके
बहुमतः
अत्यंत आदरणीय
भूत्वा
होकर
लाघवम् यास्यसि
तुच्छता को प्राप्त होगे

कृष्ण कहते हैं — जिन महारथियों की दृष्टि में तुम बहुत महान थे, वे समझेंगे कि तुम डर के कारण युद्ध से हट गए। और तुम उनकी दृष्टि में तुच्छ हो जाओगे। यह सामाजिक यथार्थ है।

यह श्लोक बताता है कि जो काम हम डर से छोड़ते हैं, उसे दुनिया डर ही समझती है — चाहे हमारा इरादा कुछ भी हो। बाहर की दुनिया परिणाम देखती है, मन की भावना नहीं।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.34 की अपकीर्ति के विचार का विस्तार है। वहाँ सामान्य लोगों की बात थी, यहाँ महारथियों — सहयोद्धाओं — की बात है।

कृष्ण यहाँ अर्जुन के अहंकार को नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारी को जगाना चाहते हैं।

अध्याय 2 · 35 / 72
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