📿 श्लोक संग्रह

क्लैब्यं मा स्म गमः

गीता 2.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
क्लैब्यम्
कायरता, नपुंसकता
मा स्म गमः
मत प्राप्त करो
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
न एतत् त्वयि उपपद्यते
यह तुम्हें शोभा नहीं देता
क्षुद्रम्
तुच्छ, छोटा
हृदयदौर्बल्यम्
हृदय की कमज़ोरी
त्यक्त्वा
छोड़कर
उत्तिष्ठ
उठो
परन्तप
शत्रुओं को तपाने वाले

कृष्ण अर्जुन से सीधे कहते हैं — कायरता मत अपनाओ, हे पार्थ, यह तुम्हें शोभा नहीं देती। फिर वे कहते हैं — इस तुच्छ हृदय की कमज़ोरी को छोड़ो और उठ खड़े हो, हे शत्रु-तपाने वाले। यह शब्द कठोर हैं, लेकिन एक गुरु अपने शिष्य से यही कहता है जब वह सही राह भूल जाता है।

कृष्ण यहाँ दो नामों से अर्जुन को बुलाते हैं — 'पार्थ' यानी पृथा (कुंती) का पुत्र, और 'परन्तप' यानी शत्रुओं को संताप देने वाला। ये नाम याद दिलाते हैं कि अर्जुन कौन हैं और उनकी शक्ति क्या है।

भगवद्गीता में यह कृष्ण का अर्जुन को सीधा आह्वान है। 'क्लैब्य' शब्द का अर्थ केवल शारीरिक कायरता नहीं — यह उस मानसिक दुर्बलता को भी कहते हैं जो अपने कर्तव्य से पीछे हटा दे।

यह श्लोक गीता के संदेश का बीज है — कर्तव्य पथ पर डटे रहो, चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन हो।

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