📿 श्लोक संग्रह

कुतस्त्वा कश्मलमिदम्

गीता 2.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
कुतः
कहाँ से
त्वा
तुम्हें
कश्मलम् इदम्
यह मोह, यह मलिनता
विषमे
इस कठिन अवसर पर
अनार्यजुष्टम्
अनार्यों द्वारा सेवित
अस्वर्ग्यम्
स्वर्ग न दिलाने वाला
अकीर्तिकरम्
अपकीर्ति करने वाला
अर्जुन
हे अर्जुन

कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं — यह मोह और मलिनता इस कठिन घड़ी में तुम्हारे मन में कहाँ से आई? कृष्ण तीन बातें कहते हैं — यह भाव अनार्यों जैसा है, यह स्वर्ग के योग्य नहीं, और यह अपकीर्ति का कारण बनेगा।

यहाँ कृष्ण कड़ा प्रश्न पूछ रहे हैं — एक दयालु मित्र की तरह नहीं, बल्कि एक गुरु की तरह जो शिष्य की गलती सीधे सामने रखता है। वे अर्जुन को झकझोरना चाहते हैं ताकि वे अपनी असल स्थिति को समझें।

भगवद्गीता के अनुसार यह कृष्ण का अर्जुन को पहला उत्तर है। 'कश्मल' शब्द का अर्थ है मानसिक मैल या मोह — वह भ्रम जो सही निर्णय लेने से रोकता है।

यहाँ 'विषमे' शब्द महत्वपूर्ण है — युद्धभूमि एक असाधारण परिस्थिति है, और ऐसे कठिन समय में मोह और भी घातक होता है।

अध्याय 2 · 2 / 72
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