📿 श्लोक संग्रह

तं तथा कृपयाविष्टम्

गीता 2.1 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
तम्
उन्हें (अर्जुन को)
तथा
इस प्रकार
कृपया आविष्टम्
करुणा से भरे हुए
अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्
आँखें आँसुओं से भरी हुईं
विषीदन्तम्
शोक करते हुए
इदम् वाक्यम्
यह वचन
उवाच
बोले
मधुसूदनः
मधुसूदन (श्रीकृष्ण)

यह श्लोक संजय के मुख से कहा गया है। संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का आँखों देखा हाल सुना रहे हैं। वे बताते हैं कि अर्जुन करुणा से भर गए थे — उनकी आँखें आँसुओं से डबडबा आई थीं और वे शोक में डूबे थे। ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे ये बात कही।

यह वह क्षण है जब गीता का असली उपदेश शुरू होने वाला है। अर्जुन का यह भाव कोई कमज़ोरी नहीं — वे एक प्रेमी और संवेदनशील मनुष्य हैं। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि इस करुणा के पीछे अज्ञान छुपा है, और उसे दूर करना ज़रूरी है।

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का यह पहला श्लोक है। पहले अध्याय में अर्जुन ने अपना धनुष रख दिया था और रोते हुए रथ में बैठ गए थे। अब दूसरे अध्याय में कृष्ण का उत्तर आरंभ होता है।

संजय यहाँ मधुसूदन नाम से कृष्ण को पुकारते हैं — जो मधु दैत्य का वध करने वाले हैं। यह नाम यहाँ उचित है क्योंकि कृष्ण अर्जुन के मन के भ्रम-दैत्य को दूर करने वाले हैं।

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