संजय बताते हैं — हे भारत (धृतराष्ट्र), हृषीकेश (कृष्ण) ने दोनों सेनाओं के बीच शोक में डूबे उस (अर्जुन) से मुस्कुराते हुए ये वचन कहे। यह 'प्रहसन् इव' — जैसे मुस्कुराते हुए — बहुत सुंदर विवरण है।
कृष्ण का यह मुस्कुराना न उपहास है, न उदासीनता। यह उस गुरु की शांत मुस्कान है जो जानता है कि शिष्य का भ्रम दूर होने वाला है। यह आश्वासन की मुस्कान है।