📿 श्लोक संग्रह

एवमुक्त्वा हृषीकेशम्

गीता 2.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ॥
एवम् उक्त्वा
ऐसा कहकर
हृषीकेशम्
हृषीकेश (कृष्ण) से
गुडाकेशः
गुडाकेश (अर्जुन)
परन्तप
हे शत्रु-तपाने वाले (धृतराष्ट्र)
न योत्स्ये
मैं नहीं लड़ूँगा
गोविन्दम्
गोविंद (कृष्ण) से
उक्त्वा
कहकर
तूष्णीम्
चुप
बभूव ह
हो गए

संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं — इस प्रकार हृषीकेश (कृष्ण) से कहकर, गुडाकेश (अर्जुन) ने गोविंद से 'मैं नहीं लड़ूँगा' — इतना कहकर मौन हो गए। यह वाक्य बहुत सरल है लेकिन बहुत भारी है।

गुडाकेश का अर्थ है जिसने निद्रा को जीत लिया हो — अर्जुन एक जागे हुए, सचेत वीर हैं। फिर भी वे चुप हो जाते हैं। यह चुप्पी हार की नहीं, बल्कि गहरे भ्रम की निशानी है।

भगवद्गीता में यह अर्जुन के विषाद का अंतिम बिंदु है। अब कृष्ण बोलेंगे और गीता का महान उपदेश आरंभ होगा।

'न योत्स्ये' — तीन शब्दों का यह वाक्य पूरी गीता का कारण है। अर्जुन की यह एक घोषणा ही कृष्ण के उपदेश को जन्म देती है।

अध्याय 2 · 9 / 72
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