📿 श्लोक संग्रह

तमुवाच हृषीकेशः

गीता 2.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥
तम्
उन्हें (अर्जुन को)
उवाच
बोले
हृषीकेशः
हृषीकेश (कृष्ण)
प्रहसन् इव
मुस्कुराते हुए जैसे
भारत
हे भारतवंशी (धृतराष्ट्र)
सेनयोः उभयोः मध्ये
दोनों सेनाओं के बीच
विषीदन्तम्
शोक में डूबे हुए को
इदम् वचः
यह वचन

संजय बताते हैं — हे भारत (धृतराष्ट्र), हृषीकेश (कृष्ण) ने दोनों सेनाओं के बीच शोक में डूबे उस (अर्जुन) से मुस्कुराते हुए ये वचन कहे। यह 'प्रहसन् इव' — जैसे मुस्कुराते हुए — बहुत सुंदर विवरण है।

कृष्ण का यह मुस्कुराना न उपहास है, न उदासीनता। यह उस गुरु की शांत मुस्कान है जो जानता है कि शिष्य का भ्रम दूर होने वाला है। यह आश्वासन की मुस्कान है।

भगवद्गीता में यह संजय की भूमिका वाला अंतिम श्लोक है इस खंड में। अब से सीधे कृष्ण का उपदेश आरंभ होगा।

दोनों सेनाओं के बीच खड़े रहकर उपदेश देना — यह दृश्य गीता को युद्धभूमि की वास्तविकता से जोड़ता है। यह सिर्फ़ दर्शन नहीं, जीवन की कठिन परिस्थिति में दिया गया ज्ञान है।

अध्याय 2 · 10 / 72
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