📿 श्लोक संग्रह

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवान्

गीता 18.75 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥
व्यासप्रसादात्
व्यास की कृपा से
श्रुतवान् अहम्
मैंने सुना
एतत् गुह्यम् परम्
यह परम गुह्य
योगम्
योग — यह गीता-ज्ञान
योगेश्वरात् कृष्णात्
योगेश्वर कृष्ण से
साक्षात्
प्रत्यक्ष — सीधे
कथयतः स्वयम्
स्वयं कहते हुए

संजय कहते हैं — व्यास की कृपा से मैंने यह परम गुह्य योग — जिसे योगेश्वर कृष्ण ने स्वयं कहा — प्रत्यक्ष सुना।

यह कृतज्ञता का वचन है। संजय महर्षि व्यास को धन्यवाद देते हैं जिनकी कृपा से उन्हें दिव्य-दृष्टि मिली। और उस दृष्टि से उन्होंने यह अमृत-वचन सुना।

व्यास-कृत महाभारत के अनुसार, संजय को महर्षि व्यास ने दिव्य-दृष्टि दी थी ताकि वे युद्ध का आँखों-देखा हाल धृतराष्ट्र को सुना सकें।

'साक्षात् कथयतः स्वयम्' — कृष्ण स्वयं कह रहे थे, और संजय सुन रहे थे। यह प्रत्यक्ष अनुभव था।

अध्याय 18 · 75 / 78
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