संजय कहते हैं — हे राजन, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं पल-पल आनंदित होता हूँ।
यह भाव बहुत सुंदर है — याद करके आनंद। गीता सुनकर आनंद मिला था, पर याद करके भी उतना ही आनंद मिलता है। यही सच्चे ज्ञान का गुण है।
संजय कहते हैं — हे राजन, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं पल-पल आनंदित होता हूँ।
यह भाव बहुत सुंदर है — याद करके आनंद। गीता सुनकर आनंद मिला था, पर याद करके भी उतना ही आनंद मिलता है। यही सच्चे ज्ञान का गुण है।
'मुहुर्मुहुः' — पल-पल। यह शब्द आनंद की निरंतरता दर्शाता है। गीता का आनंद एक बार का नहीं — जब भी याद करो, फिर से मिलता है।
अगला श्लोक (18.77) भगवान के विराट-रूप की स्मृति से आनंद की बात करेगा।