संजय कहते हैं — हे राजन, उस हरि के महा-अद्भुत रूप को भी बार-बार याद करके मुझे महान् आश्चर्य होता है और बार-बार आनंद मिलता है।
यहाँ 'रूपमत्यद्भुतम्' — विराट-रूप की याद है। ग्यारहवें अध्याय में भगवान ने वह विराट-रूप दिखाया था। उसकी स्मृति मात्र से संजय रोमांचित हो जाते हैं।