📿 श्लोक संग्रह

यत्र योगेश्वरः कृष्णः

गीता 18.78 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णः
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं
यत्र पार्थः धनुर्धरः
जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं
तत्र श्रीः
वहाँ श्री — संपन्नता और शोभा
विजयः
विजय
भूतिः
विभूति — समृद्धि
ध्रुवा नीतिः
अचल नीति — स्थिर नैतिकता
मतिः मम
यह मेरा मत है

संजय का अंतिम और सबसे शुभ वचन — जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं — वहाँ श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है। यह मेरा दृढ़ मत है।

यह चार शब्द — श्री (शोभा), विजय (जीत), भूति (समृद्धि), नीति (धर्म-आधारित नैतिकता) — एक आदर्श जीवन के चार स्तंभ हैं। जहाँ ईश्वर का ज्ञान और मनुष्य का समर्पण मिलते हैं — वहाँ ये चारों होते हैं।

यह गीता का अंतिम श्लोक है — और यह संजय के मुख से आता है, कृष्ण के नहीं। एक साक्षी का आशीर्वाद-वचन। यही गीता की समाप्ति का सौंदर्य है।

'ध्रुवा नीति' — अचल नीति। जहाँ ज्ञान और कर्म का संगम हो, वहाँ नीति स्थिर रहती है। यही गीता का अंतिम संदेश है — और सरल आस्था का भी।

अध्याय 18 · 78 / 78
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