📿 श्लोक संग्रह

इत्यहं वासुदेवस्य

गीता 18.74 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
इति अहम्
इस प्रकार मैंने
वासुदेवस्य
वासुदेव (कृष्ण) के
पार्थस्य च महात्मनः
और महात्मा पार्थ (अर्जुन) के
संवादम् इमम्
इस संवाद को
अश्रौषम्
सुना
अद्भुतम्
अद्भुत — आश्चर्यजनक
रोमहर्षणम्
रोमांचकारी — रोम खड़े कर देने वाला

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं — इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ के इस अद्भुत और रोमांचकारी संवाद को सुना। यह गीता का साक्षी-वर्णन है।

संजय की आँखों से — जो दूर बैठे पर व्यास की कृपा से सुन पाए — यह संवाद कितना जीवंत और रोमांचकारी था! 'रोमहर्षण' — रोम खड़े हो गए।

संजय का यह वर्णन (18.74-78) गीता का बाहरी कवच है — जो गीता को महाभारत के कथा-ढाँचे में रखता है। व्यास-कृत महाभारत के अनुसार।

संजय ने यह संवाद महर्षि व्यास की कृपा से सुना था — दिव्य-दृष्टि के बल पर।

अध्याय 18 · 74 / 78
अध्याय 18 · 74 / 78 अगला →