अर्जुन कहते हैं — हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति वापस आई। मैं दृढ़ हूँ, संशय चला गया। आपका वचन करूँगा।
यह गीता का सबसे भावपूर्ण क्षण है। शिष्य का परिवर्तन। जो पहले टूटा-बिखरा था — वह अब स्थिर, स्पष्ट और संकल्पित है। यही ज्ञान का फल है।