📿 श्लोक संग्रह

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा

गीता 18.73 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥
नष्टः मोहः
मोह नष्ट हो गया
स्मृतिः लब्धा
स्मृति प्राप्त हुई — याद आई
त्वत्प्रसादात्
आपकी कृपा से
अच्युत
हे अच्युत — जो कभी न गिरे
स्थितः अस्मि
स्थित हूँ — दृढ़ हूँ
गतसन्देहः
संशय चला गया
करिष्ये वचनम् तव
आपका वचन करूँगा

अर्जुन कहते हैं — हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति वापस आई। मैं दृढ़ हूँ, संशय चला गया। आपका वचन करूँगा।

यह गीता का सबसे भावपूर्ण क्षण है। शिष्य का परिवर्तन। जो पहले टूटा-बिखरा था — वह अब स्थिर, स्पष्ट और संकल्पित है। यही ज्ञान का फल है।

'स्मृतिर्लब्धा' — स्मृति वापस आई। अर्जुन अपनी असली पहचान को याद कर पाया। यही आत्म-ज्ञान का अर्थ है — भूला हुआ स्वरूप याद आना।

गीता का पहला अध्याय अर्जुन के विषाद से शुरू हुआ था। यहाँ अठारहवें में वह दृढ़ संकल्प के साथ खड़ा है। यही परिवर्तन गीता का उद्देश्य है।

अध्याय 18 · 73 / 78
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