📿 श्लोक संग्रह

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ

गीता 18.72 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥
कच्चित् एतत्
क्या यह
श्रुतम्
सुना गया
एकाग्रेण चेतसा
एकाग्र मन से
अज्ञानसंमोहः
अज्ञान से उत्पन्न भ्रम
प्रनष्टः
पूरी तरह नष्ट हुआ
धनंजय
धन जीतने वाले — अर्जुन

भगवान अर्जुन से पूछते हैं — हे पार्थ, क्या यह एकाग्र मन से सुना? हे धनंजय, क्या अज्ञान से उत्पन्न तुम्हारा भ्रम नष्ट हुआ?

यह एक गुरु का प्रेमपूर्ण प्रश्न है। इतना सब कहा — पर सुनने वाले तक पहुँचा कि नहीं? गीता का शिक्षण यहाँ एक पड़ाव पर आकर पूछता है — 'समझे?'

इस प्रश्न का उत्तर अगला श्लोक (18.73) है — अर्जुन का उत्तर। यह गीता का वह क्षण है जब शिष्य स्वीकार करता है।

'प्रनष्ट' — पूरी तरह नष्ट। भ्रम का आंशिक जाना काफी नहीं — गीता पूर्ण स्पष्टता चाहती है।

अध्याय 18 · 72 / 78
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