📿 श्लोक संग्रह

श्रद्धावाननसूयश्च

गीता 18.71 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
श्रद्धावान्
श्रद्धालु — श्रद्धा से युक्त
अनसूयः
निंदा-रहित — बिना दोष देखे
शृणुयात् अपि
यदि केवल सुने भी
सः अपि मुक्तः
वह भी मुक्त हो जाए
शुभान् लोकान्
पवित्र लोकों को
पुण्यकर्मणाम्
पुण्यात्माओं के

भगवान कहते हैं — जो व्यक्ति श्रद्धा से और बिना किसी दोष-दृष्टि के इस गीता को सुने — वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के पवित्र लोक पाता है।

केवल सुनना — पर श्रद्धा से। यह सरल मार्ग है। गीता का पूरा अध्ययन न भी हो, पर यदि श्रद्धा-भाव से एक बार सुनो — वह भी व्यर्थ नहीं जाता।

'अनसूय' — बिना ईर्ष्या या आलोचना के। यह श्रद्धा का एक आवश्यक अंग है। जो आलोचना-भाव से सुने, वह नहीं ग्रहण कर पाता।

पाठकर्ता (18.70) और श्रोता (18.71) — दोनों के लिए फल बताया गया। गीता का क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

अध्याय 18 · 71 / 78
अध्याय 18 · 71 / 78 अगला →